मेरा पन्ना के चार साल पूरे

मुझे सभी पाठकों को बताते हुए, बेहद खुशी हो रही है कि आपके चहेते ब्लॉग मेरा पन्ना ने इसी सप्ताह चार साल पूरे किए है। आप सभी पाठकों का जो प्यार, प्रोत्साहन, सहयोग, सलाह और आलोचना मिली है, उससे  इस ब्लॉग को बेहतर बनाने मे बहुत मदद मिली है। आशा है आने वाले वर्षों मे भी आप लोगों का यही सहयोग मुझे लिखने की प्रेरणा देता रहेगा।

 ग्राफिक सौजन्य से :टीम तरकश

वैसे तो मेरे हिन्दी ब्लॉगिंग का सफर 31 अगस्त 2004 को शुरु हुआ था, लेकिन वो ब्लॉग रोमन मे था, (जिस प्लेटफार्म  पर लिखा था, अब वो ही नही रहा) । हिन्दी लेखन 3 सितम्बर 2004 को लिखना चालू हुआ था, जिसको शायद 5/6 सितम्बर को प्रकाशित किया गया था। अब ये देर क्यों हुई, ये मत पूछिएगा।  सोचा था कुछ कठिन हिन्दी के शब्द लिखेंगे, लेकिन जिस टूल से लिखते थे, उसमे काफी दिक्कते आयी। उस समय ना तो कोई सहायता करने वाला था, ना ही कोई चिट्ठाकार फोरम। इसलिए किसी तरह पोस्ट पूरी की और दो दिन बाद छाप दी। लेकिन इस परेशानी से ये जरुर हुआ कि आने वाले नए ब्लॉगरों की सहायता के लिए कमर कस ली और उन्हे ब्लॉग बनाने, हिन्दी लिखने मे भरपूर सहायता प्रदान करने का प्रयत्न किया। उसके बाद हिन्दी ब्लॉगिंग जो कुछ हुआ, वो आप सभी लोगों को पता है, यदि नही पता तो मेरे लेखों के लेखागार मे से हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास लेख श्रॄंखला पढिए।

कुछ गणित भी हो जाए: मेरा पन्ना पर लगभग 950 से ज्यादा लेख लिखे गए है,  इसमे कुछ अधूरे लेख भी शामिल है,  जिनको प्रकाशित नही किया जा सका। आज मेरा पन्ना पर लगभग 400 से 500 विजिटर प्रतिदिन आते है। आज सुबह के हिट काउंटर के अनुसार अब तक मेरा पन्ना पर कुल मिलाकर 2,18,415 लोग आ चुके है। आने वाले पाठकों मे ज्यादातर गूगल भारत के सर्च इंजन से आते है। पाठकों की अधिकतर पसन्द मेरे किस्सागोई जैसे मोहल्ला पुराण, मिर्जा साहब वाले लेख है। लेकिन मेरे तकनीकी ज्ञान को भी पाठक बखूबी झेल लेते है। अलबत्ता कुछ अलग तरह के पाठक मेरे अर्थव्यव्स्था और शेयर बाजार सम्बंधी लेख भी पसन्द करते है। आप किस तरह के लेख पसन्द करते है, मुझे बताना मत भूलिएगा। आते रहिए और पढते रहिए आपका अपना पसन्दीदा ब्लॉग मेरा पन्ना

म्युचल फंड : ग्रोथ, लाभांश अथवा लाभांश पुनर्निवेश स्कीम?

अब तक हमारे पाठकों को म्‍युचुअल फंड से सम्बंधित काफी जानकारी हो चुकी होगी। अक्सर निवेशकों के मन में म्‍युचुअल फंड की स्कीम को लेते समय ये सवाल कौंधता है कि कौन सा प्लान लें ग्रोथ प्लान( Growth), लाभांश प्लान (Dividend) अथवा लाभांश पुनर्निवेश (Dividend reinvestment) प्लान। तीनो स्कीमें कुछ विशेषताएं रखती है। आइए इस बारे मे जाने।

ग्रोथ प्लान (Growth plan)

ग्रोथ प्लान मे म्‍युचुअल फंड को जितना भी लाभ होता है, वो उस लाभ को यूनिट मे बराबर बराबर बांटकर, नेट एसेट वेल्‍यू यानी नॉव मे जोड़ दिया जाता है। इस तरह लाभ होने की दशा मे, नॉव की वैल्यू दिन ब दिन बढ़ती जाती है। आप प्रतिदिन के नॉव से शेयर की खरीद फरोख्त कर सकते है। उदाहरण के लिए आपने कोई म्‍युचुअल फंड 10 रुपए की नॉव पर खरीदा, कंपनी जो जितना भी लाभ हुआ, प्रतिदिन के हिसाब से, उसको नॉव मे समायोजित किया गया। वित्त वर्ष के आखिरी में कंपनी की नॉव 16 रुपए रही, इस तरह से निवेशकों ने 6 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से लाभ कमाया। टैक्स संबंधित जानकारी के लिए चार्ट देखिए।

लाभांश प्लान (Dividend Plan)

म्‍युचुअल फंड के लाभांश प्लान मे खर्चे काटने के बाद हुए लाभ को यूनिट धारकों में बांट दिया जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आपने कोई एक म्‍युचुअल फंड 10 रुपए में खरीदा। वित्त वर्ष के आखिर में कंपनी को प्रति यूनिट 4 रुपए का लाभ हुआ। कंपनी ने खर्चे काटकर, प्रति यूनिट 3.20 पैसे का लाभांश घोषित किया।  यह लाभांश सभी यूनिट (इस प्लान के) धारको मे बराबर बांट दिया गया। लाभांश बांटते ही यूनिट की नॉव (NAV) लाभांश के अनुपात में गिर जाती है। इस योजना मे लाभांश टैक्स फ्री होता है। अलबत्ता यदि आपने यूनिट एक साल के पहले बेची है तो शार्ट टर्म टैक्स लगेगा। एक साल बाद बेचने पर टैक्स नहीं लगता। अधिक जानकारी के लिए चार्ट देखिए।

लाभांश पुनर्निवेश (Dividend reinvestment) प्लान

यह प्लान उपरोक्त दोनों योजनाओं से थोड़ा अलग होता है। इसमे वित्त वर्ष के आखिरी मे जितना भी लाभांश होता है, उतने ही मूल्य की और यूनिट, धारक के खाते मे स्थानांतरित कर दी जाती है। इस तरह से आपका लाभ, प्रतिवर्ष पुनर्निवेशित होता रहता है। उदाहरण के लिए आपके कोई यूनिट 10 रुपए पर खरीदी, साल के आखिरी मे कंपनी को प्रति यूनिट 7 रुपए का लाभ हुआ, तो म्‍युचुअल फंड कंपनी आपको 7 रुपए के मूल्य की नई यूनिट, उस समय के नॉव के हिसाब से, आपके खाते मे स्थानांतरित कर देगी। टैक्स संबंधित जानकारी के लिए चार्ट देखिए।

ये तो रही विभिन्न योजनाओ की बात, लेकिन इनमे से कौन सी बेहतर है ? यदि आपको अपने निवेश से लगातार आय की उम्मीद है, यदि आप अपनी म्‍युचुअल फंड यूनिट को एक साल से अधिक नही रखना चाहते, तो डिवीडेंड वाला आप्शन बेहतर है। यदि आप म्‍युचुअल फंड मे निवेश दीर्घकाल के लिए कर रहे है, तो मेरे विचार से ग्रोथ वाला आप्शन बेहतर विकल्प है। इस तरह से आपका फंड अपने आप बढता रहेगा।

यदि आप अपने यूनिट को एक साल से ज्यादा के लिए रखना चाहते है, लेकिन टैक्स बचाना चाहते है तो लाभांश पुनर्निवेश स्कीम चुने। क्योंकि प्रति वर्ष लाभांश घोषित होने पर लाभांश के नयी यूनिट मिल जाएंगी और कंपनी नॉव घटा देगी। इस तरह से यूनिट बेचने पर आपको कैपिटल गेन्स कम होंगे, इस तरह से कम टैक्स लगेगा। लेकिन ये ध्यान रहे, तीनो स्कीमों में, एक वर्ष से कम समय मे यूनिट बेचने पर टैक्स देना पड़ेगा।

आप्‍शंस डेब्‍ट म्‍युचुअल फंड इक्विटी म्‍युचुअल फंड
लाभांश बिक्री लाभांश बिक्री
लाभांश कर मुक्‍त -एक साल से पहले बिक्री पर कर नियमित दायरे के अनुसार
-एक साल बाद बिक्री पर कर 20 फीसदी इंडेक्‍सेशन के साथ
कर मुक्‍त -एक साल से पहले बिक्री पर कर 10 फीसदी

-एक साल बाद बिक्री पर कर नहीं

ग्रोथ लागू नहीं -एक साल से पहले बिक्री पर कर नियमित दायरे के अनुसार
-एक साल बाद बिक्री पर कर 20 फीसदी इंडेक्‍सेशन के साथ
लागू नहीं -एक साल से पहले बिक्री पर कर 10 फीसदी

-एक साल बाद बिक्री पर कर नहीं

लाभांश पुनर्निवेश लाभांश पुनर्निवेश कर मुक्‍त -एक साल से पहले बिक्री पर कर नियमित दायरे के अनुसार
-एक साल बाद बिक्री पर कर 20 फीसदी इंडेक्‍सेशन के साथ
लाभांश पुनर्निवेश कर मुक्‍त -एक साल से पहले बिक्री पर कर 10 फीसदी

-एक साल बाद बिक्री पर कर नहीं

मेरा यह लेख मोल तोल पत्रिका मे पूर्व प्रकाशित हो चुका है। म्युचल फंड सम्बंधित किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए मुझसे सम्पर्क किया जा सकता है।

और पकड़ो मछली! अब झेलो

सबसे पहले तो अपने पाठकों से माफी चाहता हूँ कि काफी दिनो से लिख नही सका। अब हुआ यूं कि दफ़्तर मे काम का बोझ कुछ ज्यादा था, इसलिए ज्यादा पढ नही सका, अब पढूंगा नही तो लिखूंगा कैसे? इसलिए लेखन मे कुछ दिनो का अंतराल आ गया। अब कोशिश करूंगा कि कम से कम हफ़्ते मे एक या दो पोस्ट तो जरुर लिखूं, अब देखिए कहाँ तक सफ़ल होता हूँ। खैर….ये सब तो चलता ही रहेगा। आइए नज़र डालें कुछ खबरों पर। आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के प्रबंधन ने एंड्रूयू साइमंड्स को बांग्लादेश के दौरे से वापस बुलवा लिया है। कौन एंड्र्यू साइमंड्स? अरे वही जो भज्जी से भिड़ गया था। वैसे दोनो ही बड़े एंठू खिलाड़ी है, अक्सर हर किसी से भिड़ जाते है। इस बार एंड्र्य़ू साइमंड्स किसी से भिड़े नही, बल्कि मछली पकड़ने चले गए थे। आप कहेंगे मछली पकड़ने की सजा, टीम से बाहर का रास्ता, हाँ भाई, टीम ने एक बैठक बुलवायी थी, साइमंड्स ने बैठक को नजरअंदाज  करते हुए मछली पकड़ना ज्यादा उचित समझा। इसलिए आस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड ने उनको वापस आस्ट्रेलिया बुलवा भेजा कि चलो बेटा यहाँ आकर मछली पकड़ो। इसे कहते है टीम प्रबंधन। अपने यहाँ कभी बीसीसीआई ऐसा कर सकता है भला? शरद पंवार आप सुन रहे है क्या?

अब पिछले दिनो पाकिस्तान मे मियां मुशर्रफ़ को चलता किया गया। बेचारे काफी जहीन इंसान थे, थे नही है भई। इनके पास कश्मीर समस्या का फार्मूला था। लेकिन कोई इनकी सुनता तब ना। आगरा आए तो अटल ने इनकी सुनी, लेकिन आडवानी नही माने, नतीजा बैरंग वापस लौटे। फार्मूला होने से कुछ नही होता, फार्मूला तो ये परमाणु बम का भी सम्भाल कर नही रख सके। इनके वैज्ञानिक गली गली इस फार्मूले को बेचते पकड़े गए। इधर मुशर्रफ़ क्या गए, सत्ता की बंदरबाट मे नवाज और जरदारी भिड़ गए। अब नवाज भी सरकार से बाहर है, कारण? अरे वही सुप्रीम कोर्ट के जजो की बर्खास्तगी। जरदारी कभी नही चाहते कि चौधरी साहब वापस चीफ़ जस्टिस बने, नही तो इनके सारे केस दोबारा खुल जाएंगे, अब बेचारे जरदारी उमर के इस पड़ाव मे जेल तो नही ही जाना चाहेंगे। ये तो राष्ट्रपति की कुर्सी का लालच ना होता तो ये मुशर्रफ़ को भी ना हटाते। बेचारे मुशर्रफ़, जरदारी के राष्ट्रपति पद के मोह मे चलता किए गए। कुछ भी हो, मुशर्रफ़ को याद रखा जाएगा। अब पाकिस्तान फिर से पतन की राह पर अग्रसर होगा, इसके आसार दिखने भी लगे है। थोड़ा समय और इंतजार करिए..देखते जाइए होता है क्या।

अब जहाँ इन्तजार की बात है, वो तो भारत ने भी काफी किया, ओलम्पिक मे तीन तीन पदक पाने का। इत्ते सालों बाद ओलम्पिक मे भारत को तीन पदक एक साथ मिले। वो भी सरकारी तंत्र के होते हुए। सरकार खेलो को प्रोत्साहन देने का भले ही कितना भी नाटक करे, लेकिन असल बढावा तो इन सरकारी खेल संस्थाओं मे बैठे आला अफसरों के पेटों का होता है। इत्ता पैसा खा जाते है, डकार भी नही लेते, नतीजा वही….हर चार साल मे ओलम्पिक मे हम लोग सर झुका कर वापस आते है, अगले साल अच्छा करने का प्रण लेकर। हर बार यही होता आया है।

अब जहाँ तक प्रण की बात है, प्रण तो अमरीकी सरकार ने भी किया हुआ कि परमाणु करार को NSG से मंजूर करवाने का। भारत भी पहले पहले तो अड़ा रहा कि हम मसौदे मे कोई बदलाव नही करेंगे वगैरहा वगैरहा। लेकिन जहाँ तक मेरा विचार है कि आखिरकार थोड़ा बहुत शब्दों की बाजीगरी होगी और ये करार NSG से मंजूर हो जाएगा। उसके बाद अमरीका आफिशयली पाकिस्तान को टा टा बाय बाय करेगा और भारत के साथ खुलकर आएगा।

टा टा बाय बाय करने की बार रतन टाटा की भी थी। वो भी थक गए थे, ममता बनर्जी के रोजमर्रा के धरने से। अब सिंगूर प्लांट मे काम बन्द पड़ा है, बुद्ददेव भट्टाचार्या की रातो की नींद हराम होने की बारी आ गयी। क्योंकि अगर ये प्लांट पश्चिम बंगाल के बाहर चला गया तो बुद्ददेव बाबू तो गए काम से। ममता बनर्जी इसको अपनी नैतिक जीत बताएंगी और टाटा कोर्ट मे खींच लेंगे। बेचारे बंगाली बाबू, बुरे फंसे है।

चलते चलते : मिर्जा का कहना है कि हमे आस्ट्रेलिया चलना चाहिए, काहे? वहाँ पर औरते ज्यादा है मर्द कम।मिर्जा के मुताबिक वहाँ पर मौजां ही मौजां होगी, आपका क्या कहना है इस बारे में।

निकालो मुझे यहाँ से

कितनी बार आप किसी बोरिंग मीटिंग मे फंसे है? कितनी बार आप कुछ ऐसे डिसकशन मे उलझे है जहाँ से भाग निकलना ही बेहतर होता है? लेकिन अक्सर ऐसा सम्भव नही हो पाता। कई बार आप कुछ ऐसी जगहों पर फांस लिए जाते है, जहाँ से निकलने मे ही अपनी भलाई समझते है, जैसे नेताजी की मीटिंग, स्वामी जी का प्रवचन, बीबी जी की शॉपिंग, बच्चों के स्कूल का बोरिंग कैथलिक ड्रामा, वगैरहा वगैरहा। लेकिन सवाल यह उठता है कि इन सबसे कैसे निबटा जाए। चिंता मत कीजिए, आपका मोबाइल फोन ही आपको वहाँ से सुरक्षित निकाल सकता है। जी हाँ आपका मोबाइल फोन। कैसे? बसGetmooh (Get me out of here) की साइट पर जाइए। अपनी नम्बर और समय बताइए, कम्प्यूटर आपको स्वयं फोन करेगा। बस आपको सिर्फ़ फोन सुनने के बाद, ऐसे दिखाना है कि आपके बॉस/पत्नी का फोन है ( ध्यान रहे, बॉस के सामने बॉस के फोन या बीबी के सामने बीबी के फोन का नाटक मत करना, नही तो बेटा गए बारह के भाव), या फिर अर्जेन्ट कोई जरुरी काम आ पड़ा है। यह तरीका आपको बॉस से अर्जेन्ट छुट्टी दिलाने मे भी काम आ सकता है। यकीन ना आए तो स्वयं ट्राई करिए।

यह सेवा किस तरह से काम करती है?

इस सेवा को प्रयोग करना बहुत आसान है।

  • अपना फोन नम्बर (अंतर्राष्ट्रीय फोन फॉरमेट: अपने दे श के कोड के साथ) साइट पर जाकर बताएं।
  • आपको फोन करने का समय बताएं।
  • अपनी पसन्द की आवाज/संगीत  चुने।
  • अपना इमेल डालें।
  • और अपना पासवर्ड प्राप्त करें।

नया पासवर्ड कैसे प्राप्त करें?

  • इस लिंक पर जाएं
  • अपना मोबाइल नम्बर दें।
  • SMS द्वारा अपने मोबाइल पर नया पासवर्ड प्राप्त करें।
  • पासवर्ड द्वारा साइट पर लॉगिन करें।

आप अपनी सभी कॉल्स के बारे मे भी जान सकते है, इसके लिए आपको साइट पर लॉगिन करना होगा।

यदि आप चाहते है कि आप अपनी मनपसन्द रिकार्डिंग सुने तो उसके लिए अपनी आवाज रिकार्ड करिए और इनको भेज दीजिए। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।

विशेष : यह साइट इंटरनैट एक्सप्लोरर पर ही सही ढंग से चलती है। फायरफाक्स और अन्य ब्राउजर्स पर इसमे कुछ दिक्कत है।

इंटरनैट पर यह एक अकेली ऐसी सेवा नही है। एक और ऐसी ही सेवा है SorryGottaGo इसको भी जरुर देखिएगा।

( Via Lifehacker )

म्युचल फंड : एसआईपी अथवा एकमुश्त निवेश?

किसी भी म्‍युचुअल फंड के निवेशक के लिए सबसे बड़ा सवाल होता है कौन से फंड का चुनाव करें। मान लीजिए आपने अपनी जोखिम क्षमताओं का आंकलन करते हुए फंड स्कीम का चुनाव कर लिया। अब दूसरा सबसे बड़ा सवाल उठता है कि निवेश कैसे करें ?  एकमुश्त निवेश किया जाए अथवा किसी एसआईपी के द्वारा निवेश किया जाए। इस बारे मे विस्तार से चर्चा करने से पहले आइए जान लेते है कि म्‍युचुअल फंड मे निवेश के दोनों तरीको मे क्या फर्क है।

एक मुश्त निवेश: इसमें निवेशक अपनी सुविधा अनुसार, एक साथ एक बड़ी रकम, अपने मनपसन्द म्‍युचुअल फंड में, निवेशित करता है। यह एक सामान्य तरीका है, जिसमें निवेशक अपनी सुविधानुसार अपने निवेश का समय और निवेश की जाने वाली रकम का निर्णय लेता है। इस तरह से वह बार बार निवेश करने के झंझट से बच जाता है। अब चूंकि निवेश करने का समय, निवेशक की सुविधा अनुसार होता है, इसलिए वह उचित मौके की तलाश करके (जब बाजार अपने निचले स्तर पर हो) अपना पैसा निवेश करता है। इस तरह निवेशक बाजार के उतार चढ़ाव का भरपूर फायदा उठाकर, उचित मौके की तलाश करके ही अपने पैसे का निवेश करता है। लेकिन बाजार का निचला स्तर कौन सा हो, इसका निर्णय लेना बहुत कठिन है।

सिस्टमेटिक इनवेस्‍टमेंट प्लान: चूंकि सभी निवेशक बड़े नहीं होते और उनके पास संसाधन भी सीमित होते है, इसलिए म्‍युचुअल फंड कंपनियों ने निवेशको के लिए एसआईपी प्लान बनाए है, जिसमे आप निश्चित अवधि तक,  अनुशासित तरीके से, हर महीने (अथवा त्रैमासिक अथवा किसी भी आवृति मे) अपने मनपसन्द म्‍युचुअल फंड में निवेश कर सकते है। इस तरह के निवेश में बाजार के उतार चढ़ाव और जोखिमों  से बच जाते है। आम निवेशक का निवेश छोटी रकम का होता है इसलिए एक लंबे समय के अंतराल में आपका निवेश एक बाजार के उतार चढ़ाव को समायोजित करता रहता है। यह निवेश का एक काफी पुराना और आजमाया हुआ तरीका है। इस तरह के निवेश मे आपकी जेब पर कोई बड़ा बोझ नही पड़ता, जिस तरह हर महीने आपके दूसरे खर्चे होते है, उस तरह से निवेश भी अपने आप होता रहता है।

लेकिन सवाल फिर वही खड़ा हो जाता है, एकमुश्त अथवा सिस्टमेटिक इनवेस्‍टमेंट ? मान लीजिए आपके पास 60 हजार रुपए है जिनको आप म्‍युचुअल फंड में निवेश करना चाहते है। आप एक साथ पूरा पैसा अपने मनपसन्द म्‍युचुअल फंड में लगा दें अथवा प्रतिमाह पांच हजार रुपए की एसआईपी लगा दें ? इस सवाल का जवाब सीधा साधा नही है। इसके लिए काफी चीजों का ध्यान देना होता है, जैसे:

बाजार की स्थिति: यदि शेयर बाजार अपने निचले स्तरों पर है, तो एकमुश्त निवेश हमेशा ही फायदेमंद होता है। चूंकि आपके आंकलन के अनुसार बाजार अपने निचले स्तर पर है और आपको उसके बेहतर होने की उम्मीद है, इसलिए एसआईपी लगाने में आपको एनएवी हमेशा पिछली एनएवी से बढ़ी हुई मिलेगी। इसलिए बढ़ते हुए बाजार में एसआईपी में निवेश करना कोई समझदारी नहीं कही जाएगी। उसके उलट यदि बाजार लगातार गिरता जा रहा है, उस समय आप एकमुश्त रकम यदि निवेशित करते है तो आपका निवेश आपको नुकसान ही देगा, उस स्थिति में आपके लिए सही विकल्प एसआईपी ही रहेगा। लेकिन परेशानी यही आती है, कि बाजार अपने निचले स्तरों पर है अथवा नही, ये निवेशक समझने में भूल-चूक कर सकता है।

निवेश की अवधि: आपके निवेश की अवधि महत्वपूर्ण रोल अदा करती है। यदि आपके सामने अगले पांच साल मे कोई बड़ा खर्चा जैसे, बच्चे की पढ़ाई, घर की खरीद अथवा कोई अन्य कार्य नहीं है, उस स्थिति में एक मुशत निवेश करने में ही ज्यादा समझदारी होगी। आपका निवेश बाजार के किस स्तर पर हुआ है, इसका कोई अधिक मायने नहीं रखता, क्योंकि एसआईपी में बढ़ते/घटते बाजार में एवरेज करते हुए निवेश करते है। मेरे विचार में एसआईपी के निवेशक को दीर्घकालीन सोचना चाहिए, तभी म्‍युचुअल फंड के निवेश से अच्छा फायदा उठा सकेंगे।

निवेशक की मनोदशा: अक्सर देखा गया है कि एकमुश्त निवेश की तरफ़दारी करने वाले, सही मौके के आने पर भी म्‍युचुअल फंड में निवेश करने में भूल-चूक कर जाते है या फिर उस समय कोई बड़ा खर्चा सामने आ जाता है। इसका सीधा सीधा मतलब है कि निवेशक अनुशासित निवेशक की श्रेणी में नही आता। उस स्थिति में एसआईपी का निवेश उचित रहता है।

निवेशित किए गए फंड का प्रकार: कुछ फंड बाजार के ठीक विपरीत चलते है। मतलब की बाजार की उठापटक से उन पर कोई विशेष प्रतिकूल फर्क नही पड़ता, इस तरह के म्युचल फंड में सही समय पर एकमुश्त निवेश करना ही लाभकारी होता है।

निवेश की उपलब्धता: निवेशक को सबसे पहले अपनी जेब को देखना चाहिए। यदि आप एक साथ बड़ी रकम का निवेश नहीं कर सकते, तो फिर एसआईपी का रुट ही आपके लिए श्रेष्ट है।

संक्षेप में कहा जाए, तो एसआईपी का निवेश छोटे निवेशक के लिए, लंबी अवधि में लाभ का सौदा है। यदि बाजार लगातार हिचकोले खा रहा है उस अवस्था में भी एसआईपी में निवेश अच्छा रहता है। आपकी म्‍युचुअल फंड से सम्बंधित यदि कोई सवाल/जिज्ञासा है तो उसे जरुर पूछें। अगली बार हम बात करेंगे कि म्‍युचुअल फंड के किस तरह के प्लान (ग्रोथ प्लान अथवा  लाभांश (Dividend) प्लान) में निवेश करें ?

सूचना: मेरा यह लेख तोल मोल पत्रिका मे पूर्व प्रकाशित हो चुका है।

शेविंग क्रीम के विकल्प

सुबह के सात बजे है, जैसे ही अलार्म क्लॉक ने अलार्म बजाया, मिर्जा साहिब हड़बड़ा के उठ बैठे। तुरन्त कूदकर बाथरुम मे पहुँचे। नित्य क्रियाओं से निबटने के बाद, जैसे ही शेविंग वाले बक्से की तरफ़ हाथ बढाया तो दिमाग भन्ना गया। शेविंग क्रीम तो खत्म हो गयी है, अब क्या करें? अभी तो गुप्ता की परचून की दुकान भी नही खुली होगी, फिर उसके यहाँ शेविंग क्रीम मिले ना मिले, करे भी तो क्या करें।कभी कभी ऐसी स्थिति हम सभी के साथ आती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शेविंग क्रीम ना होने पर उसके कौन कौन से विकल्प घर पर ही उपलब्ध है। चलिए हम बताए देते है, आगे पढिए ना भई।

साबुन : जी हाँ आपका नहाने का साबुन। घर पर शेविंग क्रीम हो ना हो, लेकिन साबुन शर्तिया मिलेगा। यदि आप चेहरे की सुरक्षा चाहते है तो ग्लिसरीन वाला या बेबी सोप प्रयोग करिए, अन्यथा कोई भी साबुन चलेगा, लेकिन रिन वगैरहा मत लगा लेना, बाद मे डंडा लेकर हमारे पीछे पड़ो, कि तुमने ही सुझाया था, अब चेहरे के दानो का इलाज बताओ।

बालों का कन्डीशनर : घर पर अगर साबुन भी ना हो (लानत है।) तो बालों के कन्डीशनर से काम चलाया जा सकता है। अब आप कहेंगे कि साबुन नही, कन्डीशनर कैसे होगा। होगा यार! आप सपना साबुन भले ही भूल जाए, घर की लेडीज अपना शैम्पू/कन्डीशनर लेना कभी नही भूलती। कन्डीशनर मे वो सारे गुण होते है जो एक शेविंग क्रीम मे होते है, झाग भले ही अच्छा ना बने, लेकिन काम सही करेगा।

शैम्पू : शैम्पू भी प्रयोग कर सकते है, ध्यान रखिएगा बेबी शैम्पू हो तो बेहतर। शैम्पू से एक और फायदा होगा, चेहरे की गन्दगी/मैल भी साफ़ हो जाएगी। ट्राई करिएगा।

बेबी ऑयल : बच्चों का तेल, किसी भी बाल बच्चे वाले घर मे मिल जाएगा। इसका प्रयोग भी कर सकते है। इससे एक दिक्कत आ सकती है, उस्तरे (Razor) को वो स्मूथनैस नही मिलेगी, लेकिन काम चल जाएगा। एक बात और, तेल अगर रेज़र मे फँस जाए तो दो तीन बार पानी से धोना पड़ सकता है।

बॉडी लोशन : हाथो की क्रीम अथवा बॉडी लोशन मे वो स्मूथनैस होती है जो शेविंग करते समय जरुरी होती है। इससे आपके चेहरे पर निखार भी आएगा। वो कहते है ना, हींग लगे ना फिटकरी, रंग…….

मूँगफली का मक्खन : बच्चे पीनट बटर बहुत पसन्द करते है, उम्मीद है बच्चों की जिद के कारण आप इसको खरीद लाए हो, इसको भी शेविंग क्रीम के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल कर सकते है।

डिशवाशिंग लिक्विड : अगर ऊपर बताए गया कोई भी सामान घर पर ना हो (वैसे उस केस शायद आप गुरद्वारे के बाहर ही बैठे, लंगर का इंतजार करते हुए बन्दे होगे), तो डिशवाशिंग अथवा बर्तन धोने वाले लिक्विड सोप का इस्तेमाल भी कर सकते है। ये भी ना हो तो हाथ धोने वाले लिक्विड से काम चलाइए।

नहाते नहाते शेव करिए : यदि इनमे से किसी का भी इंतजाम ना हो सकते तो शॉवर के नीचे, बिना कुछ भी लगाए,नहाते नहाते शेव करिएगा। एकदम परफैक्ट शेव बनेगी।

उम्मीद है इन सभी से आपका काम बन जाएगा। कोई ना कोई चीज तो घर पर जरुर होगी,क्या कहा? ये भी नही, तो भैया घर पर काहे बैठे हो, आओ हमारे साथ, ब्लॉगिंग मे टाइम वेस्ट करो ना। वैसे भी एक दिन शेव ना करोगे तो कोई आसमान थोड़े ही टूट पड़ेगा। अच्छा भैया अब हम चलते है, मिर्जा साहब बाहर इंतजार कर रहे है। आपको भी कोई और विकल्प पता हो तो जरुर बताइएगा।

इस लेख की प्रेरणा (टोपो आइडिया) इस लेख से मिला।

एल्लो! अब मोटे लोगों की संगति भी बुरी

ये भी कोई खबर हुई भला? एक नए शोध के अनुसार, मोटे लोगों की संगति करने से आप भी मोटापे के शिकार हो सकते है। शोधकर्ताओं के अनुसार जाने अंजाने आपके आस पास रहने वाले मोटे लोगों का असर आपकी सेहत पर भी पड़ सकता है। उम्मीद है कि आपका वजन भी बढ जाए। यार बात कुछ हजम नही हुई।

अगर इस शोध मे मोटे लोगों के विचारों की वजह से उनके आसपास के लोगों का वजन बढता है तो फिर तो ये बहुत खतरनाक हुआ। क्योंकि वजनी ब्लॉगरों के कारण ढेर सारे लोग मोटापे के शिकार हो सकते है। यदि ऐसा हुआ तो एक सार्वजनिक चेतावनी जारी करनी पड़ेगी कि सभी पाठक अमित गुप्ता और समीर लाल जैसे वजनी ब्लॉगरों से लोग सावधान हो जाएं, अन्यथा अपने मोटापे के लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे।

समीर लाल के नाम पर याद आया कि आगामी 29 जुलाई को समीर भाई पूरे पूरे xx वर्ष के हो जाएंगे (आप क्या समझे थे, हम उनकी सही उमर बता देंगे यहाँ पर, उसके बाद मुझे क्या क्या जिल्लत झेलनी पड़ती इसका अंदाजा है आपको?)। समीर भाई को जन्मदिन को ढेर सारी बधाईयां। सभी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि समीर भाई को जन्मदिन बधाई अवश्य दें, और केक के पैसे भी अवश्य मांगे।

जहाँ तक मेरा मानना है कि मोटापा बढने के कुछ कारण हो सकते है, जैसे खान-पान मे नियंत्रण ना रखना, मेहनत वाले काम ना करना, ज्यादा टीवी देखना, या फिर कोई बीमारी। मोटापा घटाने के लिए अधिक से अधिक पानी पीजिए, व्यायाम करिए, खान-पान पर नियंत्रण रखिए और टीवी कम देखिए। रही बात संगति से मोटापा बढने के शोध की, मेरा मानना है कि किसी की संगति से मोटापा बढने के चांसेस बहुत कम है। आपका क्या सोचना है इस बारे में?

यूपीए जीती लेकिन लोकतंत्र हारा

कल संसद मे पेश किए गए, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए विश्वास प्रस्ताव मे सत्ताधारी यूपीए सरकार की जीत हुई। उसके पक्ष मे 275 वोट पड़े और विपक्ष मे 256 वोट पड़े। इस तरह 19 वोटों से यूपीए की जीत हुई।इसके पहले सदन मे हुई बहस मे कल स्टार स्पीकर रहे लालू प्रसाद यादव, जिन्होने अपने स्टाइल मे जमकर सभी की खिंचाई की।लालू उवाच:

वामदलों पर : “जब वामदलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो लोग मुझसे पूछ रहे थे कि अब मैं क्या करूंगा? मैंने उनसे कहा कि चार साल पहले हमें उनसे (गठबंधन से) प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा”। भई, चार साल से जिस डाल पर बैठे हो, उसी को काटने की क्या जरूरत है”।

आडवानी पर: “आडवाणी जी ने कल बहस के दौरान एक भी बार परमाणु करार का विरोध नहीं किया, सिर्फ सरकार का विरोध करते रहे”।

मायावती पर : “सब प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, मायावती जी से मेरे अच्छे संबंध हैं…वे प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं…अरे भई, मैं भी तो प्रधानमंत्री बनना चाहता हूं…यहां बैठे सभी सदस्य प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन ऐसे ही थोड़े कोई प्रधानमंत्री बन जाता है। लेकिन मै मायावती की तरह, हड़बड़ी मे नही हूँ।"

लालू ने कहा जब राहुल ‘कलावती…कलावती’ कह रहे थे तो विपक्ष के लोग हंस रहे थे, उन्होंने कहा, “कलावती हमारे गांवों में बहू/बेटियों  का नाम होता है, आप ‘हम्पी…डम्पी’ जैसे नाम रखने वाले लोग यह क्या जानें”।

लेकिन कल भारतीय संसद मे कुछ ऐसा भी कुछ हुआ जिससे लोकतंत्र शर्मसार हुआ। तीन बीजेपी सांसदों ने सदन मे एक करोड़ के नोट लहराते हुए कहा कि यह पैसा उन्हे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं की ओर से, वोट प्रस्ताव पर अनुपस्थित रहने के लिए मिला था। संसद सदस्यों के बारे मे पैसा लेने और भ्रष्टाचार की बात तो हमेशा से ही कही जाती रही है, लेकिन संसद की जो गरिमा कल तक हुई थी, उन्हे इन सांसदों ने तार तार कर दिया। इस प्रकरण से कई सवाल उठते है:

  • यदि बीजेपी सांसदों को पैसा मिला था तो नेता विपक्ष(लाल कृष्ण आडवानी) ने लोकसभा स्पीकर अथवा उप स्पीकर को पहले विश्वास मे क्यों नही लिया?
  • बीजेपी सांसदों ने ना तो पुलिस मे रिपोर्ट की और ना ही मीडिया को इस बारे मे बताया। यदि वे पाक साफ़ थे तो उन्हे मीडिया को बुलाकर पैसे देने वालों को बेनकाब कर देना चाहिए था।
  • चूंकि पैसा सुबह सुबह ही दिया था, इसलिए इसकी जानकारी सदन की कार्यवाही शुरु होते ही, अथवा पैसा मिलते ही स्पीकर को बता दी जानी चाहिए थी।
  • एक करोड़ रुपए की धनराशि, संसद के अंदर आयी कैसे? क्या सांसद अपने बैग मे कुछ भी रखकर ला सकते है? क्या सुरक्षाकर्मी सो रहे थे? ये सांसद इतने बड़े नामी सांसद नही है जो इनकी तलाशी ना ली जा सके।
  • आपको याद होगा, पिछले स्टिंग आपरेशन मे, यही वे बीजेपी के सांसद थे जो साठ साठ हजार रुपए के लिए बिक गए थे और मीडिया ने इनको बेनकाब किया था। इनकी पार्टी ने भी इनको निलम्बित किया हुआ था। जो सांसद फकत साठ हजार के लिए बिक गया, वो तीन करोड़ रुपए के लिए ईमानदारी दिखाए….बात कुछ हजम नही हुई।

कुछ भी हो, इससे लोकंत्रत की गरिमा और बीजेपी की साख को धक्का जरुर लगा है। लेकिन बीजेपी ने कुछ खोया है तो कुछ पाया भी है, इन्होने मायावती के अरमानों पर पानी फेर दिया है और दोबारा वापस लाइमलाइट मे आ गए है।आपका क्या सोचना है इस बारे में?

जरा देखना तो, 272 हुए क्या?

आज यूपीए और विपक्षी पार्टियों की हालत कुछ इस कदर हो गयी है, उठते बैठते लोग एक दूसरे से यही सवाल पूछते है जरा देखना तो, 272 सांसद हुए क्या? अब क्या करें भई, ये 272 का आंकड़ा है ही इत्ता मुश्किल। चार को साधो तो दो और उखड़ जाते है, तीन को पकड़कर नजरबंद करो तो तीन और बहनजी के पीछे खड़े मिलते है। कुल मिलाकर जबरदस्त ऊंहापोह की स्थिति है, पक्ष हो या विपक्ष किसी को भी नही पता कि कुल कितने सांसद उसके साथ है। दूसरी पार्टीयों की तो छोड़ो, कुल मिलाकर अपनी पार्टी के बन्दे ही पार्टी-लाइन पर वोटिंग करे, इसकी भी कोई गारंटी नही है। कोई गारंटी दे भी नही सकता, नेता कौम ही ऐसी होती है।

अब आप कहेंगे कि इस लेख का शीर्षक हमने ऐसे क्यों रखा। चलिए इसी बात पर हमे अपने बचपन की  एक बात बताते है। बचपन मे कानपुर मे टीवी लखनऊ दूरदर्शन के द्वारा आया करता था। जब तक टीवी सही चलता तब तक तो सब ठीक ठाक ही रहता, लेकिन जैसे ही कोई अंधड़/तूफान वगैरहा आता तो एंटीना का रुख बिगड़ जाता, नतीजतन टीवी पर सिर्फ़ मच्छर ही दिखाई देते। तब घर की टास्क फोर्स एक्शन मे होती, ठीक उसी तरह जैसे यूपीए की टास्कफ़ोर्स एक्शन मे है। घर के सबसे मजबूत बन्दे को, ऊपर एटीना घुमाने के लिए लगाया जाता, फिर छत पर एक बन्दा उससे कम्यूनिकेशन करता, सीढी मे भी एक बन्दा होता, घर के अन्दर आंगन मे एक बन्दा खड़ा रहता और एक ठीक टीवी के सामने खड़ा रहता, फुल वाल्यूम के साथ। कुल मिलाकर पूरा परिवार क्राइसिस मैनेजमेंट करता, अगर कोई मेहमान भी आया हुआ होता तो वो भी यथासम्भव इस काम मे हाथ बँटाता। ऊपर से हाँक लगायी जाती जरा देखना, दूरदर्शन आया क्या, हाँक छत वाले बन्दे से, सीढी वाले बन्दे तक पहुँचती वहाँ से आंगन वाले से होते हुए, कमरे वाले बन्दे तक आवाज पहुँचती, जहाँ से वो हाँ या ना कहता और वापस कम्यूनिकेशन ऊपर वाले तक उसी तरीके से पहुँचता। एंटीना घुमाने मे कभी कभी तो चैनल (तब एक ही तो था यार!) की पिक्चर आ जाती, कभी आवाज, कभी दोनो गायब हो जाते। ठीक उसी तरह जैसे आगे की लाइन वाले, दस सांसदों को साधो तो पिछली पंक्ति वाले तीन सांसद गायब हो जाते है। कुछ ऐसी ही स्थिति भी यूपीए सरकार की है, इनका एंटीना हिल गया है। आइए जरा सभी दलों की स्थिति पर नजर घुमा ली जाए।

सबसे बड़ा रिस्क लिया है, समाजवादी पार्टी ने। क्यों? अव्वल उसके मतदाताओ मे मुसलमान वोटर काफी संख्या मे है। इस न्यूक्लियर डील से किसी को कुछ लेना देना हो या नही, लेकिन मुसलमान बुश और उसके अमरीका से बुरी तरह से खफ़ा है। लेकिन वो कहते है ना, अपने हित के आगे दूसरों का हित कौन देखे। मायावती ने मुलायम की नाक मे दम कर रखा है (इन लोगो ने भी मायावती को फूल मालाए थोड़ी पहनायीं थी, जो बोएंगे वही तो काटेंगे) । इस स्थिति मे मुलायम सिंह कांग्रेस और मायावती से दोतरफ़ा मोर्चा नही खोल सकते, इसलिए माया के कहर से बचने के लिए, दूरगामी सोच के तहत कांग्रेस से दोस्ती (अस्थायी ही सही) की गयी। मतदाताओं का विश्वास गया तेल लेने, अपने आप को बचा लें, तभी तो मतदाताओं का सोचेंगे।

उधर कांग्रेस भी बेचारी क्या करे, परमाणु करार की सारी तैयारी तो बहुत पहले ही हो चुकी थी, उसको अमली जामा तक पहनाया जा चुका था, बुश अंकल भी जाते जाते इस पर मोहर लगाकर जाना चाहते है। मनमोहन सिंह तो पहले ही जिद पकड़ चुके है, करार नही तो प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देंगे। कांग्रेस के पास वैसे भी ज्यादा कुछ दिखाने को है नही, 9% ग्रोथ रेट की ऐसी हवा निकली है जैसे इंडिया शाइनिंग की निकली थी। फिर एक एक करके सारे राज्य भी हाथ से निकले जा रहे है। महंगाई इत्ती बढ गयी है (दो दिनो मे प्रति सांसद 30 करोड़ से 80 करोड़ का रेट हो गया है, आप ही बताइए महंगाई बढी है कि नही?) कि महंगाई का सूचकांक ही ग्रोथ रेट से ऊपर निकल गया है। अब कुछ बचा सकता है तो सिर्फ़ परमाणु करार ही है, जिसके सहारे अगले चुनाव मे नैया पार लगने की उम्मीद है।

लेफ़्ट वाले भी बेचारे क्या करें। इत्ती बार गरज गरज कर आखिर कभी तो बरसना ही था। वैसे भी लेफ़्ट वालों ने अपना रिकार्ड बना रखा है किसी भी सरकार को पाँच साल सपोर्ट ना देने का, उसको थोड़े ही खराब करना था। प्रकाश करात की स्थिति भी अजीब सी है, अगर ये अकेले होते तो ठीक था, शाम को वृंदा करात दिन भर की रंनिंग कमेंट्री  और रात को ए बी वर्धन के अनमोल वचन कान मे पड़ते ही सुबह फिर से सरकार गिराने का दम भरना पड़ता है। अब समर्थन वापस लेना तो चलो एक राजनैतिक कदम था, लेकिन सरकार गिराने की बात किसी के पल्ले नही पड़ रही है। कंही ना कंही चीनी कामरेडों की बुद्दि काम जरुर कर रही है।

रही बीजेपी, राजनाथ सिंह पिछली सफ़लताओं से फूले नही समा रहे। वैसे तो बीजेपी को इस समय आगे आकर सरकार को सहारा देकर एक नयी मिसाल कायम करनी थी। लेकिन बीजेपी के अनुसार, इस समय अगर चुनाव हो जाते है तो उसके पास बहुमत आने के चांसेस ज्यादा है। सही भी है, सपने देखने के लिए किसी पर रोक थोड़े ही है। बीजेपी के साथी अभी तक तो उसके साथ ही दिखाई देते है, लेकिन कौन कब हाथ से निकल जाए, पता चलता है क्या? टीडीपी वाले कब तम्बू से बाहर निकल गए, कोई रोक सका क्या? अकाली दल भी सोच विचार कर रहा है कि सरदार जी के खिलाफ़ जाएं कि नही। शिवसेना भी अपना मन पक्का करने मे लगी हुई है।

अब बहनजी यानि मायावती के बारे बात कही करेंगे तो वो भी रुठ जाएंगी। बहनजी का कहना है कि सीबीआई उनको झूठे मुकदमे मे फंसा रही है ( वैसे भी नेताओं के तो हजार पाप माफ़ होते है) , इसलिए वो खुद प्रधानमंत्री बनकर मुकदमे को रफ़ा दफा कराएंगी। यूएनपीए भी क्या करें, ले देकर सपा ही सबसे बड़ी पार्टी थी, वो निकल गयी तो यूएनपीए बैठ गया। बाकी बचे टीडीपी, चौटाला और इक्का दुक्का लोग। सभी फुंके हुए कारतूस ही है। सपा निकल गयी तो उनको अपनी साख तो बचानी ही थी। इसलिए मायवती का दामन थामने मे ही भलाई दिखी। मायावती भी ये मौका काहे छोड़ें, सपा से कुछ लोग तो टूट ही जाएंगे (यकीन मानिए डूबते जहाज को सबसे पहले चूहे ही छोड़ते है।) जित्ते आएं उतने अच्छा। मायावती जानती है, अधिकतर सांसद चुनाव नही चाहते, उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर, कुछ समय के लिए ही सही, प्रधानमंत्री पद मिले तो क्या बुरा है। हम फिर कहेंगे, सपना देखने के लिए कोई मनाही थोड़े ही है। आप भी देखो, हम भी देखे, उन्नत भारत का सपना।

सबसे ज्यादा फायदा हो रहा है छोटे दलों का। क्योंकि यही लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। सांसदों की खरीद फरोख्त हो और झारखन्ड मुक्ति मोर्चा वाले गुरुजी यानि शिबू सोरेन की बात ना हो, ऐसा हो ही नही सकता। गुरुजी बेचारे कोयला मंत्रालय छीने जाने से खफा थे, अब झारखंड का मुख्यमंत्री बनने का अरमान पाले है। टीआरएस वाले जो कि अपने प्रदेश मे ही जनाधार खो चुके है, कांग्रेस ने इनका शहद निकालकर, इनको मक्खी तरह निकाल फेंका है, इसलिए ये भी सरकार गिराना चाहते है। अपने अकेले के बूते तो कुछ ना उखाड़ सकेंगे इसलिए मायावती का दामन थामा है। एक इकलौती पार्टी है जो कह रही है, चुनाव करवा लो, वो है तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, क्योंकि उनको पता है, इस समय लेफ़्ट के भी बाजे बजे हुए है, इसका मतलब है पश्चिम बंगाल मे उनकी चाँदी ही चाँदी। कुल मिलाकर स्थिति बहुत रोचक बनी हुई है।

अभी तो बैठकों, का दौर चल रहा है। कोई भी किसी से भी जाकर मिल आता है। पता ही नही चलता कि ये समाजवादी है या बीजेपी का या फिर वापमंथी । मीटिंग मे सब कुछ तय हो जाए, सौदा पट जाए तो बाहर आकर लोग कुछ प्रेस ब्रीफ़िंग कर देते है, नही तो झोला उठाकर अगली पार्टी के नेताओं से मिलने निकल पड़ते है। पता नही कैसा लोकतंत्र है ये। जनता से कोई कुछ नही पूछता कि परमाणु करार करें कि नही, बस अपनी ही चलाए जाते है ये नेता लोग। अब आप पूछेंगे कि आपका अपना अनुमान क्या है। हालांकि मेरे को इस बात के पैसे नही मिले है, फिर भी बता देते है। मेरे व्यक्तिगत अनुमान से सरकार बच जाएगी और बहुमत भी सिद्द हो जाएगा। उसके बाद आप स्वयं देखिएगा, सरकार के खिलाफ़ बोलने वाले सभी नेताओं का रंग कैसे बदलता है। लेकिन तब तक ऊँट किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल है। आप भी देख रहिए, ग्रेट इंडियन डर्टी पॉलिटिकल शो। इस बारे मे आपका क्या विचार है?

राजनीति के हमाम मे सब नंगे

केंद्र की कांग्रेस सरकार ने अमरीका के साथ परमाणु करार की तरफ कदम क्या बढाए, वामपंथी भड़क उठे और धमकियां देने के बाद आखिरकार समर्थन वापस ले ही लिया। इस तरह से वामपंथी बैसाखियों के सहारे टिकी सरकार अल्पमत मे आ गयी। लेकिन बात सिर्फ़ यहाँ तक समाप्त नही होती। कांग्रेस ने जवाबी फायरिंग मे, सपा को अपनी तरफ़ करने के बाद,  विश्वास मत मे विजय की बात कहकर वामपंथियों के गुस्से को और बढा दिया। अब वामपंथी नेता प्रकाश करात ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। अब पक्ष और विपक्ष सांसदों की खरीद फरोख्त मे जुट गए है। सांसद भले ही अपराधी हो, जेल मे बन्द हो, अथवा रुठा हुआ बैठा हो, मनाने मे कोई कोर कसर नही छोड़ी जा रही। छोटी छोटी मांगे (जैसे एयरपोर्ट का नाम बदलना, जेल से अस्पताल मे शिफ़्ट करवाना) तुरन्त मानी जा रही है। सभी लोग सूटकेस लेकर दरवाजे पर खड़े है। सांसदों के तो सारे खर्चे निकल आए, इसे कहते है डिमांड और सप्लाई का खेल।

वामपंथियों को पहली गलती तो यह रही, समर्थन वापसी के बाद, सरकार गिराने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया, उधर कांग्रेस की मजबूरी थी, आखिर बुश पा जी (जोड़ कर भी पढ सकते है) को वायदा जो किया हुआ था। बीजेपी तो जैसे मौके की तलाश मे पहले से ही थी। सही भी है, कर्नाटक मे मिली जीत से हौंसले बुलन्द जो है। लेकिन इस सांसदों की तलाश की आपाधापी मे सभी पार्टियां अपने अपने कपड़े उतारती दिखी। पक्ष हो या विपक्ष हर तरफ़ नंगे ही नंगे दिखे। कोई वैल्यू, सम्मान, संवैधानिक जिम्मेदारिया,  संसदीय गरिमा, मतदाताओं का विश्वास कुछ भी इनको नही दिखा। दिखे भी क्यों, मतदाता के विश्वास तो ये लोग उसी दिन बेच खाते है जिस दिन सरकार बनाते है। अब रही बात मतदाता की, वो तो अगले चुनाव के पहले फिर से पटा लिया जाएगा।

अब 22 जुलाई को होने वाले विश्वास मत का चाहे जो कुछ हो, लेकिन मतदाता यही सोच रहा है, काश! हमने इन सांसदों को ना चुना होता…..लेकिन भारतीय राजनीति मे हमेशा यही होता आया है और यही होता रहेगा। हे ईश्वर! कब तक हमे ऐसे लोगो को झेलना पड़ेगा? ऐसे स्वार्थी नेताओं से देश को बचाओ,  या फिर इन सभी को एक साथ अपने पास ही बुलवा लो ना, कम से कम धरती का बोझ तो कम हो।